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क़ुसूर न करना क़ुसूर था!
उसके करम पे शक तुझे ज़ाहिद ज़रूर था,वरना तेरा क़ुसूर न करना क़ुसूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’
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बिछड़ना ज़रूर था!
दुनिया है ये किसी का न इसमें क़ुसूर था,दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’
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सत्य!
बाबा नागार्जुन अपने समय के एक महत्वपूर्ण कवि रहे हैं, बड़े फक्कड़ अंदाज़ में बेबाक ढंग से अपनी बात रखते थे| आज की बाबा नागार्जुन जी की कविता, जैसा कि इसके कथ्य से ही स्पष्ट है, आपातकाल में लिखी गई थी| उस समय बाबा नागार्जुन जेल में भी रहे थे| लीजिए आज प्रस्तुत है बाबा…
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तुमने भी अगर देखा है!
क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना,मेरे महबूब को तुमने भी अगर देखा है| मजरूह सुल्तानपुरी