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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th May 2022

    बदी के सामने नेकी अभी तक!

    बदी के सामने नेकी अभी तक,सिपर-अंदाज़ होती जा रही है| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    आवाज़ होती जा रही है!

    नहीं आता समझ में शोर-ए-हस्ती,बस इक आवाज़ होती जा रही है| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    आवाज़ होती जा रही है!

    ख़मोशी साज़ होती जा रही है,नज़र आवाज़ होती जा रही है| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    मै-कदों में मगर दूर दूर था!

    ‘मुल्ला’ का मस्जिदों में तो हमने सुना न नाम,ज़िक्र उसका मै-कदों में मगर दूर दूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    चेहरे पे नूर था!

    पीते तो हमने शैख़ को देखा नहीं मगर,निकला जो मै-कदे से तो चेहरे पे नूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    जिसे जितना शुऊर था!

    इस इक नज़र के बज़्म में क़िस्से बने हज़ार,उतना समझ सका जिसे जितना शुऊर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    क़ुसूर न करना क़ुसूर था!

    उसके करम पे शक तुझे ज़ाहिद ज़रूर था,वरना तेरा क़ुसूर न करना क़ुसूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    बिछड़ना ज़रूर था!

    दुनिया है ये किसी का न इसमें क़ुसूर था,दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    सत्य!

    बाबा नागार्जुन अपने समय के एक महत्वपूर्ण कवि रहे हैं, बड़े फक्कड़ अंदाज़ में बेबाक ढंग से अपनी बात रखते थे| आज की बाबा नागार्जुन जी की कविता, जैसा कि इसके कथ्य से ही स्पष्ट है, आपातकाल में लिखी गई थी| उस समय बाबा नागार्जुन जेल में भी रहे थे| लीजिए आज प्रस्तुत है बाबा…

  • 6th May 2022

    तुमने भी अगर देखा है!

    क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना,मेरे महबूब को तुमने भी अगर देखा है| मजरूह सुल्तानपुरी

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