-
मगर नींद भी न आई हो!
वो तो सोते जागते रहने के मौसमों का फुसूँ,कि नींद में हों मगर नींद भी न आई हो| परवीन शाकिर
-
खिड़की से मुस्कराई हो!
कभी तो हो मेरे कमरे में ऐसा मंज़र भी,बहार देख के खिड़की से मुस्कराई हो| परवीन शाकिर
-
मेहँदी की बाड़ उगाई हो!
गुलाबी पाँव मेरे चम्पई बनाने को,किसी ने सहन में मेहँदी की बाड़ उगाई हो| परवीन शाकिर
-
प्यार हवा मेरे नाम लाई हो!
कोई तो हो जो मेरे तन को रोशनी भेजे,किसी का प्यार हवा मेरे नाम लाई हो| परवीन शाकिर
-
रंग मेरे हाथ का हिनाई हो!
हथेलियों की दुआ फूल ले के आई हो,कभी तो रंग मेरे हाथ का हिनाई हो| परवीन शाकिर
-
गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई!
कोई आहट, कोई आवाज़, कोई छाप नहीं,दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई| परवीन शाकिर
-
राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं!
अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं,अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई| परवीन शाकिर
-
न कभी टूट कर, बिखरे कोई!
जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा-रेज़ा,इस तरह से, न कभी टूट कर, बिखरे कोई| परवीन शाकिर
-
तेरा नाम न पढ़ ले कोई!
काँप उठती हूँ मैं सोच कर तन्हाई में,मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई| परवीन शाकिर
-
बिखरने से न रोके कोई!
अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई,और बिखर जाऊँ तो, मुझको न समेटे कोई| परवीन शाकिर