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आईना अभिशाप है सूने मकान में!
तस्वीर के लिये भी कोई रूप चाहिये,ये आईना अभिशाप है सूने मकान में। उदय प्रताप सिंह
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आंख में पानी नहीं रहा!
इन बादलों की आंख में पानी नहीं रहा,तन बेचती है भूख एक मुट्ठी धान में। उदय प्रताप सिंह
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हिंदोस्ताँ कहां है अब!
ये रोज कोई पूछता है मेरे कान मेंहिंदोस्ताँ कहां है अब हिंदोस्तान में। उदय प्रताप सिंह
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तुमको ही याद किया, तुमको भुलाने के लिए!
आज मैं स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ | निदा फ़ाज़ली साहब की शायरी में एक सधुक्कड़ी अंदाज़ देखने को मिलता है| मैंने पहले भी निदा साहब की बहुत सी रचनाएं शेयर की हैं, क्या ग़ज़ब की शायरी और दोहे हैं निदा साहब के- ‘मैं रोया परदेस में, भीगा मां…
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सिमटा-सा एक मकां तन्हा!
जलती-बुझती-सी रोशनी के परे,सिमटा-सिमटा-सा एक मकां तन्हा| मीना कुमारी (महज़बीं बानो)
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चलते रहें कहां तन्हा!
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,दोनों चलते रहें कहां तन्हा| मीना कुमारी (महज़बीं बानो)