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तड़पती हैं तमन्नाएँ!
तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले,लुटा होगा न यूँ कोई दिल-ए-नाकाम से पहले| क़तील शिफ़ाई
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इक मौज दबे पाँव!
इक मौज दबे पाँव तआ’क़ुब में* चली आई,हम ख़ुश थे बहुत रेत की दीवार बना कर|*पीछे से क़तील शिफ़ाई
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तू न जिया न मरा – स्व. प्रेम शर्मा जी का गीत
आज एक बार मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से स्वर्गीय प्रेम शर्मा जी का एक गीत अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ, गीत के बोल हैं- ‘तू न जिया न मरा, ज्यों कांटे पर मछली, प्राणों में दर्द पिरा’ आशा है आपको पसंद आएगा।धन्यवाद
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हम लाए हैं घर में!
डर है कि न ले जाए वो हम को भी चुरा कर,हम लाए हैं घर में जिसे मेहमान बना कर| क़तील शिफ़ाई
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लूटा है सदा जिसने!
लूटा है सदा जिस ने हमें दोस्त बना कर, हम ख़ुश हैं उसी शख़्स से फिर हाथ मिला कर| क़तील शिफ़ाई
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क्यों जागा करते हो कविवर!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- क्यों जागा करते हो कविवरखोज रहे हो क्या रातों में! केवल छत को देख सकोगेलेट पलंग पर कमरे में तुमबहुमंज़िला इमारत है यहइधर हुआ है चंदा भी गुम, छिटपुट तारे देख उन्हेंक्या उलझाओगे बातों में। ये दुनिया का मेला भ्रम हैकिसे यहाँ संतोष मिलेगा,भाग्यवान वह…
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दस्तार जिन्हें दी है!
शर्मिंदा उन्हें और भी ऐ मेरे ख़ुदा कर,दस्तार जिन्हें दी है उन्हें सर भी अता कर| क़तील शिफ़ाई
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ज़ियादा कामयाबी भी!
ज़ियादा कामयाबी भी बहुत नुक़सान देती है,फलों का बोझ बढ़ने से भी पौदे टूट जाते है| वसीम नादिर