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अँधेरी सुरंग हूँ!
रिश्ते गुज़र रहे हैं लिए दिन में बत्तियाँ,मैं बीसवीं सदी की अँधेरी सुरंग हूँ| सूर्यभानु गुप्त
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मेरा नाम आदमी!
मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी,मेरा वुजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूँ| सूर्यभानु गुप्त
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कॉलर का रंग हूँ!
हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ,मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ| सूर्यभानु गुप्त
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उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से!
हर पुरवा का झोंका तेरा घुँघरू,हर बादल की रिमझिम तेरी भावना,,हर सावन की बूंद तुम्हारी ही व्यथाहर कोयल की कूक तुम्हारी कल्पना| जितनी दूर ख़ुशी हर ग़म से,जितनी दूर साज सरगम से,जितनी दूर पात पतझर का छाँव से,उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से| कुंवर बेचैन
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बिछुए जितनी दूर कुँआरे पाँव से!
जितनी दूर नयन से सपना,जितनी दूर अधर से हँसना,बिछुए जितनी दूर कुँआरे पाँव से,उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से! कुंवर बेचैन
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साहिल पे कश्तियों को—
गर दे गया दग़ा हमें तूफ़ान भी “क़तील”,साहिल पे कश्तियों को डूबोया करेंगे हम| क़तील शिफ़ाई
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जिस्मों को चाँदनी में —
जब दूरियों की आग दिलों को जलायेगी,जिस्मों को चाँदनी में भिगोया करेंगे हम| क़तील शिफ़ाई
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मिलकर जुदा हुए तो—
मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम,एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम| क़तील शिफ़ाई