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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Jul 2022

    घरौंदे तो घरौंदे, चटानें टूट जाती हैं!

    घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं, उड़ाने के लिए आँधी अगर नाम-ओ-निशाँ आई| मुनव्वर राना

  • 6th Jul 2022

    बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई!

    क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता, ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई| मुनव्वर राना

  • 6th Jul 2022

    न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई!

    मेरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी, तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई| मुनव्वर राना

  • 6th Jul 2022

    परदेस ले जाएगी फिर शायद!

    किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद, उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई| मुनव्वर राना

  • 6th Jul 2022

    दुनिया भी आई तो कहाँ आई!

    अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता, बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई| मुनव्वर राना

  • 6th Jul 2022

    लेकिन न वापस जा के माँ आई!

    यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया, मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ आई| मुनव्वर राना

  • 6th Jul 2022

    मेरे हिस्से में माँ आई!

    किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई, मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई | मुनव्वर राना

  • 6th Jul 2022

    निराला के प्रति

    स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी को कवियों का कवि कहा जाता था, अर्थात उनकी कविताओं का अध्ययन करते हुए नए कवि काव्य लेखन सीख सकते हैं, ऐसे भी कह सकते हैं कि जिनकी कविताओं को सामान्य श्रोताओं की अपेक्षा कवियों से, काव्य मर्मज्ञों से अधिक सराहना प्राप्त होती है| श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी हिन्दी…

  • 5th Jul 2022

    कोई सुबह को कोई जाये शाम!

    रुके नहीं कोई यहाँ नामी हो कि अनाम,कोई जाये सुबह् को कोई जाये शाम| गोपाल दास नीरज

  • 5th Jul 2022

    मिलावट से बने रोज़ यहाँ सरकार!

    करें मिलावट फिर न क्यों व्यापारी व्यापार,जबकि मिलावट से बने रोज़ यहाँ सरकार| गोपाल दास नीरज

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