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प्रेम
छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| कविता के हर काल का अपना मुहावरा होता है, अभिव्यक्ति का अपना अलग अन्दाज़ होता है| आज की कविता में पंत जी ने अपने तरीके से प्रेम को अभिव्यक्ति दी है| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सुमित्रानंदन…
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चाहने वालों की तरह!
जिन्दगी! जिसको तेरा प्यार मिला वो जानेहम तो नाकाम रहें, चाहने वालों की तरह। जां निसार अख़्तर
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आवारा ख्यालों की तरह!
जुस्तजू ने किसी मंजिल पे ठहरने न दिया,हम भटकते रहें आवारा ख्यालों की तरह| जां निसार अख़्तर
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मेरे हाथ में छालों की तरह!
और तो मुझ को मिला क्या मेरी मेहनत का सिला,चंद सिक्के हैं मेरे हाथ में छालों की तरह| जां निसार अख़्तर
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सुलगते हैं सवालों की तरह!
मुझसे नजरे तो मिलाओ कि हजारों चेहरे,मेरी आंखों में सुलगते हैं सवालों की तरह| जां निसार अख़्तर
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दिल में कुछ दर्द चमकते हैं!
हम से मायूस न हो ऐ शब-ए-दौराँ कि अभी,दिल में कुछ दर्द चमकते हैं उजालों की तरह| जां निसार अख़्तर
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मैं कल रात नहीं रोया था!
आज एक बार फिर से मैं किसी ज़माने में अपने मधुर गीतों के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले, अपनी रचना ‘मधुशाला’ के कारण विशेष ख्याति प्राप्त हिन्दी कवि और अमिताभ बच्चन जी के पूज्य पिताश्री स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| सरल भाषा में गहन बात कहना बच्चन…
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तेरे अबरू तेरे लब!
तेरी ज़ुल्फ़ें तेरी आँखें तेरे अबरू तेरे लब,अब भी मशहूर हैं दुनिया में मिसालों की तरह| जां निसार अख़्तर
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महकते हैं शिवालों की तरह!
गुनगुनाते हुए और आ कभी उन सीनों में,तेरी खातिर जो महकते हैं शिवालों की तरह| जां निसार अख़्तर