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मेरा दिल ही दुखाने आई!
तेरी मानिंद तेरी याद भी ज़ालिम निकली,जब भी आई है मेरा दिल ही दुखाने आई| कैफ़ भोपाली
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इक आवाज़ बुलाने आई!
मैंने जब पहले-पहल अपना वतन छोड़ा था,दूर तक मुझको इक आवाज़ बुलाने आई| कैफ़ भोपाली
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खुशबू ये मुझे मेरे सिरहाने आई!
दिल में आहट सी हुई रूह में दस्तक गूँजी,किसकी खुशबू ये मुझे मेरे सिरहाने आई| ‘कैफ़’ भोपाली
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कुछ अक्ल ठिकाने आई!
आजकल फिर दिल-ए-बर्बाद की बातें है वही,हम तो समझे थे के कुछ अक्ल ठिकाने आई| ‘कैफ़’ भोपाली
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मेरी तनहाई चुराने आई!
दर ओ दीवार पे शकलें सी बनाने आई,फिर ये बारिश मेरी तनहाई चुराने आई| ‘कैफ़’ भोपाली
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मेरे साजन हैं उस पार!
फिल्म- ‘बंदिनी’ के लिए शैलेन्द्र जी का लिखा एक प्रसिद्ध गीत आज शेयर कर रहा हूँ जिसे नूतन जी और अशोक कुमार जी पर फिल्माया गया था| शैलेन्द्र जी के लिखे इस भाव भरे गीत के लिए संगीत और स्वयं अपना स्वर दिया था स्वर्गीय सचिन देव बर्मन जी ने| बर्मन दा के स्वर में…
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ये दयार-ए-इश्क़ है!
ये दयार-ए-इश्क़ है इसमें सहर,बस्तियाँ कम कम हैं वीराने बहुत| महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’
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देने हैं नज़राने बहुत!
ये जिगर, ये दिल, ये नींदें, ये क़रार,इश्क़ में देने हैं नज़राने बहुत| महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’