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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Mar 2022

    पतवारें न देख!

    एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख । दुष्यंत कुमार

  • 3rd Mar 2022

    आकाश के तारे न देख!

    आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख । दुष्यंत कुमार

  • 3rd Mar 2022

    कौन कहता है कि कविता मर गई?

    धर्मवीर भारती जी की एक लंबी कविता आज शेयर कर रहा हूँ| यह कविता अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ में शामिल की गई थी| कविता लेखन के साथ ही, गंभीर रचनाकारों को हमेशा यह चिंता बनी रहती है कि विपरीत परिस्थितियों के कारण कहीं कविता मर न जाए, लेकिन परिस्थिति जैसी भी हों, कविता…

  • 2nd Mar 2022

    जब आसमां से कोई!

    जमीं की कैसी वकालत हो फिर नहीं चलती,जब आसमां से कोई फैसला उतरता है। वसीम बरेलवी

  • 2nd Mar 2022

    कुछ चांदनी सी बातें हों!

    तुम आ गए हो तो कुछ चांदनी सी बातें हों,ज़मीं पे चांद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है। वसीम बरेलवी

  • 2nd Mar 2022

    सहरा भी है समुंदर भी!

    ये देखना है कि सहरा भी है समुंदर भी,वो मेरी तिश्ना-लबी किसके नाम करता है। वसीम बरेलवी

  • 2nd Mar 2022

    शराफ़तों की यहाँ कोई –

    शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं,किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है। वसीम बरेलवी

  • 2nd Mar 2022

    हवाओं के पर कतरता है!

    खुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते,कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है। वसीम बरेलवी

  • 2nd Mar 2022

    जरा सा क़तरा!

    जरा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है,समंदरो ही के लहजे में बात करता है। वसीम बरेलवी

  • 2nd Mar 2022

    मुझको क्या-क्या नहीं मिला!

    हिन्दी नवगीत के प्रणेता स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में उन्होंने जीवन की स्वाभाविक संपन्नताओं के साथ ही विपन्नताओं का उल्लेख किया है और आज के जीवन की जटिलताओं, संकटों की ओर भी बड़ा प्रभावी संकेत किया गया है|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद…

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