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पतवारें न देख!
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख । दुष्यंत कुमार
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आकाश के तारे न देख!
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख । दुष्यंत कुमार
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कौन कहता है कि कविता मर गई?
धर्मवीर भारती जी की एक लंबी कविता आज शेयर कर रहा हूँ| यह कविता अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ में शामिल की गई थी| कविता लेखन के साथ ही, गंभीर रचनाकारों को हमेशा यह चिंता बनी रहती है कि विपरीत परिस्थितियों के कारण कहीं कविता मर न जाए, लेकिन परिस्थिति जैसी भी हों, कविता…
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मुझको क्या-क्या नहीं मिला!
हिन्दी नवगीत के प्रणेता स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में उन्होंने जीवन की स्वाभाविक संपन्नताओं के साथ ही विपन्नताओं का उल्लेख किया है और आज के जीवन की जटिलताओं, संकटों की ओर भी बड़ा प्रभावी संकेत किया गया है|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद…