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ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो!
तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची,ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर तक पहुँची| राहत इन्दौरी
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कुछ देर और बैठो!
आज फिर से मैं स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी अपने समय के प्रमुख हिन्दी कवियों में शामिल थे और साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन से संबद्ध थे| लीजिए आज प्रस्तुत है सर्वेश्वर जी की यह कविता, जो प्रेमी-प्रेमिका की एक मन के स्तर पर घटनापूर्ण…
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होली की शुभकामनाएं|
कान्हा बरसाने में आ जाइयो,बुलाय गई राधा प्यारी| रंग पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएं|
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तो कितना अच्छा होता!
आज शैलेन्द्र जी का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| शैलेन्द्र जी मेरे अत्यंत प्रिय फिल्मी गीतकार हैं, जिनको मैं फिल्मों का जनकवि भी कहता हूँ| आज का यह गीत 1961 में रिलीज हुई फिल्म- ‘ससुराल’ कि लिए लिखा गया था और इसको शंकर जयकिशन की जोड़ी के संगीत निर्देशन में, मुकेश जी और…