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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Mar 2022

    ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो!

    तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची,ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर तक पहुँची| राहत इन्दौरी

  • 19th Mar 2022

    कुछ देर और बैठो!

    आज फिर से मैं स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी अपने समय के प्रमुख हिन्दी कवियों में शामिल थे और साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन से संबद्ध थे| लीजिए आज प्रस्तुत है सर्वेश्वर जी की यह कविता, जो प्रेमी-प्रेमिका की एक मन के स्तर पर घटनापूर्ण…

  • 18th Mar 2022

    मैं जो डूबा, उभर गया कोई!

    इश़्क भी क्या अजीब दरिया है,मैं जो डूबा, उभर गया कोई| सूर्यभानु गुप्त

  • 18th Mar 2022

    दीप ही दीप धर गया कोई!

    मैं अमावस की रात था, मुझमें,दीप ही दीप धर गया कोई| सूर्यभानु गुप्त

  • 18th Mar 2022

    पत्थरों तक अगर गया कोई!

    मूरतें कुछ निकाल ही लाया,पत्थरों तक अगर गया कोई| सूर्यभानु गुप्त

  • 18th Mar 2022

    इतने खाए थे रात से धोखे!

    इतने खाए थे रात से धोखे,चाँद निकला कि डर गया कोई| सूर्यभानु गुप्त

  • 18th Mar 2022

    शाम आई तो मर गया कोई!

    दिन किसी तरह कट गया लेकिन,शाम आई तो मर गया कोई| सूर्यभानु गुप्त

  • 18th Mar 2022

    मुझसे होकर गुज़र गया कोई!

    आम रस्ता नहीं था मैं, फिर भी,मुझसे होकर गुज़र गया कोई| सूर्यभानु गुप्त

  • 18th Mar 2022

    होली की शुभकामनाएं|

    कान्हा बरसाने में आ जाइयो,बुलाय गई राधा प्यारी| रंग पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएं|

  • 18th Mar 2022

    तो कितना अच्छा होता!

    आज शैलेन्द्र जी का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| शैलेन्द्र जी मेरे अत्यंत प्रिय फिल्मी गीतकार हैं, जिनको मैं फिल्मों का जनकवि भी कहता हूँ| आज का यह गीत 1961 में रिलीज हुई फिल्म- ‘ससुराल’ कि लिए लिखा गया था और इसको शंकर जयकिशन की जोड़ी के संगीत निर्देशन में, मुकेश जी और…

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