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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 30th Sep 2022

    बुझने दो उनको हवा तो चले!

    चाँद सूरज बुज़ुर्गों के नक़्श-ए-क़दम, ख़ैर बुझने दो उनको हवा तो चले| कैफ़ी आज़मी

  • 30th Sep 2022

    क़ाफ़िला तो चले!

    ख़ार-ओ-ख़स तो उठें रास्ता तो चले, मैं अगर थक गया क़ाफ़िला तो चले| कैफ़ी आज़मी

  • 30th Sep 2022

    ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम..

    गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे, ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा| कैफ़ी आज़मी

  • 30th Sep 2022

    मिरे घर में न रौशनी का रहा!

    लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उसका, सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा| कैफ़ी आज़मी

  • 30th Sep 2022

    सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा!

    जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा, बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा| कैफ़ी आज़मी

  • 30th Sep 2022

    पथ में किरण-छुरे!

    आज एक बार फिर मैं अपने अग्रज और गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी उन कवियों में शामिल हैं, जिनके गीतों को मैं कविता का शौक पैदा होने के बाद अक्सर गुनगुनाया करता था| मैंने पहले भी बेचैन जी की बहुत सी…

  • 29th Sep 2022

    गुनह हमने एक बार किया!

    फिर न माँगेंगे ज़िंदगी या-रब, ये गुनह हमने एक बार किया| गुलज़ार

  • 29th Sep 2022

    अपना ही इंतिज़ार किया!

    हमने अक्सर तुम्हारी राहों में, रुककर अपना ही इंतिज़ार किया| गुलज़ार

  • 29th Sep 2022

    आदतन हमने ए’तिबार किया!

    आदतन तुमने कर दिए वा’दे, आदतन हमने ए’तिबार किया| गुलज़ार

  • 29th Sep 2022

    कितनी ख़ुश-रंग दिखाई दी है!

    आग में क्या क्या जला है शब भर, कितनी ख़ुश-रंग दिखाई दी है| गुलज़ार

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