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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Oct 2022

    जज़्बात के ज़ख़्म खा रहा हूँ!

    है शहर में क़हत पत्थरों का, जज़्बात के ज़ख़्म खा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    प्यासा ही पलट के जा रहा हूँ!

    दरिया-ए-फ़ुरात है ये दुनिया, प्यासा ही पलट के जा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ!

    अहबाब को दे रहा हूँ धोखा, चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    आईना उसे दिखा रहा हूँ!

    महरूम-ए-नज़र है जो ज़माना, आईना उसे दिखा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    सूरज से बदन छुपा रहा हूँ!

    सीने में मिरे है मोम का दिल, सूरज से बदन छुपा रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    शीशे के महल बना रहा हूँ!

    हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ, शीशे के महल बना रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई

  • 2nd Oct 2022

    जिससे अपनी पीर कहूँ मैं!

    आज मैं एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ, जो मेरे अत्यंत प्रिय कवि से संबंधित है|लीजिए फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीत कवि स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। कविता, गीत आदि स्वयं अपनी बात कहते हैं और जितना ज्यादा प्रभावी रूप से कहते हैं, वही…

  • 1st Oct 2022

    रास्ते में सितारे लुटाएँ हम!

    तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़, आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम| अहमद फ़राज़

  • 1st Oct 2022

    न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम!

    इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब, इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम| अहमद फ़राज़

  • 1st Oct 2022

    आप ही अपनी सदाएँ हम!

    सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था, सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम| अहमद फ़राज़

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