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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 26th Sep 2022

    मुझको मोहब्बत कहाँ कहाँ!

    आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ, उफ़ ले गई है मुझको मोहब्बत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 26th Sep 2022

    मूल्य दे सुख के क्षणों का!

    आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि, सीनियर बच्चन जी की एक सुंदर रचना शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों की शान हुआ करते थे, उनको सुनने के लिए श्रोतागण दूर-दूर से कवि सम्मेलनों में आते थे| मैंने पहले भी बच्चन जी के बहुत से…

  • 25th Sep 2022

    वो फिर दर दर नहीं जाता!

    ‘वसीम’ उससे कहो दुनिया बहुत महदूद है मेरी, किसी दर का जो हो जाए वो फिर दर दर नहीं जाता| वसीम बरेलवी

  • 25th Sep 2022

    मसअला बाहर नहीं जाता!

    मोहब्बत के ये आँसू हैं उन्हें आँखों में रहने दो, शरीफ़ों के घरों का मसअला बाहर नहीं जाता| वसीम बरेलवी

  • 25th Sep 2022

    लौट के फिर घर नहीं जाता!

    खुले थे शहर में सौ दर मगर इक हद के अंदर ही, कहाँ जाता अगर मैं लौट के फिर घर नहीं जाता| वसीम बरेलवी

  • 25th Sep 2022

    अपने बाप के ऊपर नहीं जाता!

    घरों की तर्बियत क्या आ गई टी-वी के हाथों में, कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता| वसीम बरेलवी

  • 25th Sep 2022

    दुनिया से कोई ले कर नहीं जाता!

    बुरे अच्छे हों जैसे भी हों सब रिश्ते यहीं के हैं, किसी को साथ दुनिया से कोई ले कर नहीं जाता| वसीम बरेलवी

  • 25th Sep 2022

    तअ’ल्लुक़ मर नहीं जाता!

    वो मेरे घर नहीं आता मैं उसके घर नहीं जाता, मगर इन एहतियातों से तअ’ल्लुक़ मर नहीं जाता| वसीम बरेलवी

  • 25th Sep 2022

    अकेला होने लगता है!

    ये दिल बचकर ज़माने भर से चलना चाहे है लेकिन, जब अपनी राह चलता है अकेला होने लगता है| वसीम बरेलवी

  • 25th Sep 2022

    नींद चुराने वाली- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

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