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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Mar 2022

    कोई आयेगा कोई जायेगा!

    अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा,तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो| बशीर बद्र

  • 22nd Mar 2022

    ख़त आने-जाने लगे!

    पढाई-लिखाई का मौसम कहाँ,किताबों में ख़त आने-जाने लगे| बशीर बद्र

  • 22nd Mar 2022

    जहाँ शामियाने लगे!

    वहीं ज़र्द पत्तों का कालीन है,गुलों के जहाँ शामियाने लगे| बशीर बद्र

  • 22nd Mar 2022

    दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे!

    कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं,दुकानें खुलीं, कारख़ाने लगे| बशीर बद्र

  • 22nd Mar 2022

    आते-आते ज़माने लगे!

    घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख,यहाँ आते-आते ज़माने लगे| बशीर बद्र

  • 22nd Mar 2022

    परिंदे उदासी के आने लगे!

    हुई शाम यादों के इक गाँव में,परिंदे उदासी के आने लगे| बशीर बद्र

  • 22nd Mar 2022

    हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे!

    जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे,हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे| बशीर बद्र

  • 22nd Mar 2022

    सरस्वती

    हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार डॉक्टर बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर मिश्र जी श्रेष्ठ गीतकार, संपादक और राजभाषा से जुड़े उच्च अधिकारी रहे हैं| कुछ समय तक मैं और वे एक ही संस्थान – हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में रहे और मुझे एक अवसर और याद आता है जब मैंने…

  • 21st Mar 2022

    सुभाव ऐसा था!

    फ़रेब दे ही गया ‘नूर’ उस नज़र का ख़ुलूस,फ़रेब खा ही गया मैं, सुभाव ऐसा था| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 21st Mar 2022

    लहू का रचाव ऐसा था!

    वो जिसका ख़ून था वो भी शिनाख्त कर न सका,हथेलियों पे लहू का रचाव ऐसा था| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

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