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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Apr 2022

    यूँ बेख़बर है वो जैसे!

    मेरे वुजूद से यूँ बेख़बर है वो जैसे,वो एक धूपघड़ी है मैं रात का पल हूँ| जावेद अख़्तर

  • 6th Apr 2022

    वो पुल भी गया!

    कम से कम उसको देख लेते थे,अब के सैलाब में वो पुल भी गया| जावेद अख़्तर

  • 6th Apr 2022

    सूर्य और दीपनिष्ठा

    एक श्रेष्ठ व्यक्ति और कवि जो सांसद भी रहे हैं और संसदीय राजभाषा समिति का एक सदस्य होने के नाते उन्होंने राजभाषा हिन्दी की प्रगति हेतु भी प्रयास किए हैं, ऐसे स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की तीन छोटी छोटी रचनाएं आज शेयर कर रहा हूँ| बैरागी जी का कविता पढ़ने का अपना अनूठा अंदाज़ था,…

  • 5th Apr 2022

    बात हुई है उसे भुलाने में!

    वह शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गयी जैसे,अजीब बात हुई है उसे भुलाने में| जावेद अख़्तर

  • 5th Apr 2022

    ज़िंदगी से यूँ खेले!

    अपनी वजहे-बरबादी सुनिये तो मज़े की है,ज़िंदगी से यूँ खेले जैसे दूसरे की है| जावेद अख़्तर

  • 5th Apr 2022

    इस गुल में कोई सोता क्या!

    गली में शोर था मातम था और होता क्या,मैं घर में था मगर इस गुल में कोई सोता क्या| जावेद अख़्तर

  • 5th Apr 2022

    इक ख़्वाब हमको घेरे था!

    हमको उठना तो मुँह अँधेरे था,लेकिन इक ख़्वाब हमको घेरे था| जावेद अख़्तर

  • 5th Apr 2022

    एक ही कमरा कम है!

    सबका ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है,हर घर में बस एक ही कमरा कम है| जावेद अख़्तर

  • 5th Apr 2022

    आवाज़ में छाले हैं!

    इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं,होठों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं| जावेद अख़्तर

  • 5th Apr 2022

    मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए!

    ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया,कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए| जावेद अख़्तर

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