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ये जो ज़िन्दगी की किताब है!
ये जो ज़िन्दगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है| कहीं इक हसीन सा ख़्वाब है कहीं जान-लेवा अज़ाब* है|वेदना* राजेश रेड्डी
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अपने तो लेकिन इम्तिहाँ मे खो गए!
ज़िंदगी हमने सुना था चार दिन का खेल है,चार दिन अपने तो लेकिन इम्तिहाँ मे खो गए| राजेश रेड्डी
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और कुछ ख़िज़ाँ में खो गए!
लेके अपनी-अपनी किस्मत आए थे गुलशन में गुल,कुछ बहारों मे खिले और कुछ ख़िज़ाँ में खो गए| राजेश रेड्डी
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अश्के-रवां में खो गए!
हसरतें जितनी भी थीं सब आह बनके उड़ गईं,ख़्वाब जितने भी थे सब अश्के-रवां में खो गए| राजेश रेड्डी
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हम जिस जहाँ मे खो गए!
जुस्तजू में जिसकी हम आए थे वो कुछ और था,ये जहाँ कुछ और है हम जिस जहाँ मे खो गए| राजेश रेड्डी
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बिछुड़े परिंदे आसमाँ मे खो गए!
डाल से बिछुड़े परिंदे आसमाँ मे खो गए,इक हकी़क़त थे जो कल तक दास्ताँ मे खो गए| राजेश रेड्डी
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तुम रहे हो द्वीप जैसे!
आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे गर्व है कि मैंने अपने कई आयोजनों में सोम जी को आमंत्रित किया था और जी भरकर उनके मधुर गीतों और मंच संचालन का आनंद लिया था| लीजिए आज प्रस्तुत है आदरणीय सोम ठाकुर…
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सताये कोई तो उस को बुरा लगे!
तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उसकी अदा “क़तील”,मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे| क़तील शिफ़ाई
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मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे!
वो क़हर दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों,जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे| क़तील शिफ़ाई
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रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे!
मैं इसलिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी,मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे| क़तील शिफ़ाई