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पड़ोसी के घर आया होगा!
दिल-ए-नादाँ न धड़क ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क, कोई ख़त ले के पड़ोसी के घर आया होगा| कैफ़ भोपाली
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दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा!
कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा, मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा| कैफ़ भोपाली
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अच्छा लगा!
श्री रामदरश मिश्र जी ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपना योगदान किया है| उनकी कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज उनकी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो सामान्य ग़ज़लों से काफी लंबी है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह ग़ज़ल– आज धरती पर झुका आकाश…
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लोग कुछ डूबते नजर आए!
जब भी आंखों में अश्क भर आए लोग कुछ डूबते नजर आएचांद जितने भी गुम हुए शब के सब के इल्ज़ाम मेरे सर आए| गुलज़ार
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आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ!
चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में, थोड़ा सा आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ| गुलज़ार
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चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ!
आँखों के पोछने से लगा आग का पता, यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ| गुलज़ार
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लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में!
काली लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में, बौरा गया है मुँह से क्यूँ खुलता नहीं धुआँ| गुलज़ार
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आँसुओं के मरासिम पुराने हैं!
आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं, मेहमाँ ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ| गुलज़ार