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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Dec 2022

    काफ़ी दिन हो गये!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में उन्होंने मौत से साक्षात्कार को दर्शाने का प्रयास किया है| कभी ऐसा भी लगता है कि मौत हमारे पास से गुज़र गई है| लीजिए आज प्रस्तुत है भवानी…

  • 6th Dec 2022

    उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं!

    दाग़ दामन के हों दिल के हों कि चेहरे के ‘फ़राज़’, कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    अम्बार से लग जाते हैं!

    कतरनें ग़म की जो गलियों में उड़ी फिरती हैं, घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं!

    पहले पहले हवस इक-आध दुकाँ खोलती है, फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं!

    इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है, बाद में सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं!

    रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं, दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    अगर याद भी न आऊँ उसे!

    जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है ‘फ़राज़’, अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    वही जो राहत-ए-जाँ!

    वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ, तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    अब कहाँ से लाऊँ उसे!

    ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के, मैं कैसे बात करूँ अब कहाँ से लाऊँ उसे| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद!

    वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद, मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे| अहमद फ़राज़

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