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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Dec 2022

    और गुनगुनाऊँ उसे!

    करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे, ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    झील का ठहरा हुआ जल!

    आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| तिवारी जी के अनेक नवगीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं और उनको अनेक सम्मान भी प्राप्त हुए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत यह – उंगलियों से कभीहल्का-सा छुएँ भी तोझील का…

  • 5th Dec 2022

    बुझते बुझते एक ज़माना लगता है!

    आग का क्या है पल दो पल में लगती है, बुझते बुझते एक ज़माना लगता है| कैफ़ भोपाली

  • 5th Dec 2022

    सीधा दिल पे निशाना लगता है!

    तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं, सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है| कैफ़ भोपाली

  • 5th Dec 2022

    तेरे आगे चाँद पुराना लगता है!

    तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है, तेरे आगे चाँद पुराना लगता है| कैफ़ भोपाली

  • 5th Dec 2022

    बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा!

    ‘कैफ़’ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ, अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा| कैफ़ भोपाली

  • 5th Dec 2022

    बच्चे निकल आए होंगे!

    खेलने के लिए बच्चे निकल आए होंगे, चाँद अब उसकी गली में उतर आया होगा| कैफ़ भोपाली

  • 5th Dec 2022

    तितली को गिरा कर देखो!

    गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो, आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा| कैफ़ भोपाली

  • 5th Dec 2022

    लिक्खा था अंधेरा शायद!

    दिल की क़िस्मत ही में लिक्खा था अंधेरा शायद, वर्ना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा| कैफ़ भोपाली

  • 5th Dec 2022

    यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल!

    इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल, तूने जिस फूल को पाला वो पराया होगा| कैफ़ भोपाली

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