-
झील का ठहरा हुआ जल!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| तिवारी जी के अनेक नवगीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं और उनको अनेक सम्मान भी प्राप्त हुए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत यह – उंगलियों से कभीहल्का-सा छुएँ भी तोझील का…
-
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है!
आग का क्या है पल दो पल में लगती है, बुझते बुझते एक ज़माना लगता है| कैफ़ भोपाली
-
सीधा दिल पे निशाना लगता है!
तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं, सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है| कैफ़ भोपाली
-
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है!
तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है, तेरे आगे चाँद पुराना लगता है| कैफ़ भोपाली
-
बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा!
‘कैफ़’ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ, अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा| कैफ़ भोपाली
-
तितली को गिरा कर देखो!
गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो, आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा| कैफ़ भोपाली
-
लिक्खा था अंधेरा शायद!
दिल की क़िस्मत ही में लिक्खा था अंधेरा शायद, वर्ना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा| कैफ़ भोपाली
-
यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल!
इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल, तूने जिस फूल को पाला वो पराया होगा| कैफ़ भोपाली