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दिल पे हुक्मरानी है!
इस तरह मोहब्बत में दिल पे हुक्मरानी है,दिल नहीं मिरा गोया उन की राजधानी है| कैफ़ भोपाली
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मुस्कुरा के देख ज़रा!
तिरी नज़र से है रिश्ता मिरे गिरेबाँ का,किधर है मेरी तरफ़ मुस्कुरा के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर
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मिले तो तू ही मिले!
मिले तो तू ही मिले और कुछ क़ुबूल नहीं,जहाँ में हौसले अहल-ए-वफ़ा के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर
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वजूद-ए-इश्क़ की!
वजूद-ए-इश्क़ की तारीख़ का पता तो चले,वरक़ उलट के तू अर्ज़ ओ समा के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर
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ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में बंदिनी फिल्म के लिए मुकेश जी का गाया एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे शैलेंद्र जी ने लिखा था और इसका संगीत सचिन देव बर्मन जी ने तैयार किया था। प्रस्तुत है यह गीत, आशा है आपको पसंद आएगा- ओ जाने वाले हो…
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हर एक सम्त से!
हर एक सम्त से इक आफ़्ताब उभरेगा,चराग़-ए-दैर-ओ-हरम तो बुझा के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर
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बहार कौन सी सौग़ात!
बहार कौन सी सौग़ात ले के आई है,हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना तू आ के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर
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सूरज देर से निकला!
प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- चढ़ते समय मुंडेरकहीं क्या पांव था फिसलाआज सूरजदेर से निकला। बचपन में तो साथ हमारेजमकर खेले होअब क्यों सोच रहे सूरजतुम निपट अकेले हो, साथ तुम्हारे हैं हम अब भीयह साथ नहीं बदला। हम बूढे़ हो गएखेल वैसे न पाएंगेसमय तुम्हारे साथ मगरहम कभी…
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ग़म-ए-जहाँ से भी!
ग़म-ए-बहार ओ ग़म-ए-यार ही नहीं सब कुछ,ग़म-ए-जहाँ से भी दिल को लगा के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर
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शिकस्त-ए-ज़ुल्मत!
तुलू-ए-सुब्ह है नज़रें उठा के देख ज़रा,शिकस्त-ए-ज़ुल्मत-ए-शब मुस्कुरा के देख ज़रा| जाँ निसार अख़्तर