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धुन्ध से आना है, धुन्ध में जाना है!
संसार की हर शै का इतना ही फ़साना है,इक धुन्ध से आना है, इक धुन्ध में जाना है| साहिर लुधियानवी
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चंपा का फूल- रवींद्र नाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…
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झूठ लिक्खें तो ये क़लम टूटे!
तुझ पे मरते हैं ज़िन्दगी अब भी,झूठ लिक्खें तो ये क़लम टूटे| सूर्यभानु गुप्त
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तेरी ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म टूटे!
ज़िन्दगी कंघियों में ढाल हमें,तेरी ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म टूटे| सूर्यभानु गुप्त