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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Jul 2022

    ‘ग़ालिब’ ग़ज़लसरा न हुआ!

    कुछ तो पढिए कि लोग कहते हैं,आज ‘ग़ालिब’ ग़ज़लसरा न हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 15th Jul 2022

    रहज़नी है कि दिल-सितानी है!

    रहज़नी है कि दिल-सितानी है,ले के दिल, दिलसितां रवाना हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 15th Jul 2022

    ज़ख़्म गर दब गया, लहू न थमा!

    ज़ख़्म गर दब गया, लहू न थमा,काम गर रुक गया रवां न हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 15th Jul 2022

    हक अदा न हुआ!

    जान दी, दी हुयी उसी की थी,हक तो यह है कि हक अदा न हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 15th Jul 2022

    बन्दगी में मेरा भला न हुआ!

    क्या वो नमरूद की ख़ुदायी थी,बन्दगी में मेरा भला न हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 15th Jul 2022

    गालियां खा के बे मज़ा न हुआ!

    कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब,गालियां खा के बे मज़ा न हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 15th Jul 2022

    तमाशा हुआ गिला न हुआ!

    जमा करते हो क्यों रकीबों को,इक तमाशा हुआ गिला न हुआ? मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 15th Jul 2022

    भूल गलती- मुक्तिबोध

    आज गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ| मुक्तिबोध जी एक क्रांतिकारी कवि थे, अपने समय से आगे की कविताएं लिखी थीं उन्होंने| लीजिए आज प्रस्तुत है गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता जो उनके संकलन ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ में शामिल थी – भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर…

  • 14th Jul 2022

    अच्छा हुआ, बुरा न हुआ!

    दर्द मिन्नत-कशे-दवा न हुआ,मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 14th Jul 2022

    जलती है सहर होते तक!

    ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़मर्ग इलाज, शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक | मिर्ज़ा ग़ालिब

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