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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Jul 2022

    राह के पत्थर तो हटाते जाते!

    हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे, कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते| राहत इन्दौरी

  • 19th Jul 2022

    हँसते हैं मुझे देख के आते जाते!

    मुझको रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद, लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते| राहत इन्दौरी

  • 19th Jul 2022

    मिरी प्यास बुझाते जाते!

    मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था, तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते| राहत इन्दौरी

  • 19th Jul 2022

    नए फूल खिलाते जाते!

    रेंगने की भी इजाज़त नहीं हमको वर्ना, हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते| राहत इन्दौरी

  • 19th Jul 2022

    कोई ज़ख़्म लगाते जाते!

    अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत करके, जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते| राहत इन्दौरी

  • 19th Jul 2022

    तिरे शहर में आते जाते!

    अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है ,उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते| राहत इन्दौरी

  • 19th Jul 2022

    मिरी जान लुटाते जाते

    हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते, जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते | राहत इन्दौरी

  • 19th Jul 2022

    देशगान!

    एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| सर्वेसगवार जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे और प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल में भी शामिल थे| यह रचना स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी के कविता संकलन ‘खूँटियों’ पर टंगे लोग’ से ली गई…

  • 17th Jul 2022

    ज़ेहनों के वीराने लोग!

    हम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैं, हमको दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोग| राही मासूम रज़ा

  • 17th Jul 2022

    आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग!

    फिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आई, फिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग| राही मासूम रज़ा

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