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रात में सदियाँ गुज़र गईं!
पाया भी उनको खो भी दिया चुप भी हो रहे, इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं| कैफ़ी आज़मी
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चाँदनी रातें बिखर गईं!
पैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझे, ग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गईं| कैफ़ी आज़मी
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सब मिरे दिल में उतर गईं!
अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ, वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं| कैफ़ी आज़मी
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बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं!
दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार, कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं| कैफ़ी आज़मी
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जो घटाएँ गुज़र गईं!
क्या जाने किसकी प्यास बुझाने किधर गईं, इस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गईं| कैफ़ी आज़मी
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एक बार जो ढल जाएंगे!
आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी के प्रसिद्ध रचनाकार, अनेक साहित्यिक पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित माननीय श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी बताया है भोपाल में साहित्य और संस्कृति को समर्पित ‘भारत भवन’ की संकल्पना उनकी ही थी|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी…
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ज़ुल्फ़ों की घटा छाई भी होती है!
‘क़तील’ उस दम भी रहता है यही एहसास-ए-महरूमी, जब उन शानों पे ज़ुल्फ़ों की घटा छाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई
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कुछ तो शर्माई भी होती है!
चमकती है कोई बिजली तो शम-ए-रहगुज़र बनकर, निगाह-ए-बरहम इनकी कुछ तो शर्माई भी होती है| क़तील शिफ़ाई
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वहाँ शैख़-ओ-बरहमन की-
ब-नाम-ए-कुफ्र-ओ-ईमाँ बे-मुरव्वत हैं जहाँ दोनों, वहाँ शैख़-ओ-बरहमन की शनासाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई
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जो पहले से मुरझाई भी होती है!
बिखरती है वही अक्सर ख़िज़ाँ-परवर बहारों में, चमन में जो कली पहले से मुरझाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई