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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Sep 2022

    रात थक कर सो गई!

    इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई, हम न सोए रात थक कर सो गई| राही मासूम रज़ा

  • 11th Sep 2022

    जनता का दुलारा – शैलेन्द्र!

    फिल्म संगीत से जुड़ी पोस्ट्स शेयर करने के क्रम में आज पुनः प्रस्तुत है जनकवि शैलेन्द्र जी पर पहले लिखी गई यह पोस्ट| आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं। मैंने कहीं…

  • 10th Sep 2022

    तिरी याद न जाने निकल आए!

    एक ख़ौफ़ सा रहता है मिरे दिल में हमेशा, किस घर से तिरी याद न जाने निकल आए| मुनव्वर राना

  • 10th Sep 2022

    बहुत आगे ज़माने निकल आए!

    अब तेरे बुलाने से भी हम आ नहीं सकते, हम तुझ से बहुत आगे ज़माने निकल आए| मुनव्वर राना

  • 10th Sep 2022

    भिगोने के बहाने निकल आए!

    ऐ रेत के ज़र्रे तिरा एहसान बहुत है, आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए| मुनव्वर राना

  • 10th Sep 2022

    हम घर से कमाने निकल आए!

    मुमकिन है हमें गाँव भी पहचान न पाए, बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए| मुनव्वर राना

  • 10th Sep 2022

    ख़ज़ाने निकल आए!

    माँ बैठ के तकती थी जहाँ से मिरा रस्ता, मिट्टी के हटाते ही ख़ज़ाने निकल आए| मुनव्वर राना

  • 10th Sep 2022

    ख़त उसके पुराने निकल आए!

    अलमारी से ख़त उसके पुराने निकल आए, फिर से मिरे चेहरे पे ये दाने निकल आए| मुनव्वर राना

  • 10th Sep 2022

    आ जा रे परदेसी!!

    आज मधुमती फिल्म के लिए शैलेन्द्र जी का लिखा एक फिल्मी गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने गाया था|| लीजिए आज प्रस्तुत हैं पुराने जमाने के इस सुपरहिट मधुर गीत के बोल- आ जा रे परदेसीमैं तो कब से खड़ी इस पारये…

  • 9th Sep 2022

    तिरे लब का बदल कहते हैं!

    वो तिरे हुस्न की क़ीमत से नहीं हैं वाक़िफ़, पंखुड़ी को जो तिरे लब का बदल कहते हैं| क़तील शिफ़ाई

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