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प्रतीक्षा- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर करने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के…
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घर आओ तो यारों की तरह!
हमसे दरवेशों के घर आओ तो यारों की तरह, हर जगह ख़स-ख़ाना ओ बर्फ़ाब मत देखा करो| अहमद फ़राज़
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ज़ेर-ए-आब मत देखा करो!
इस तमाशे में उलट जाती हैं अक्सर कश्तियाँ, डूबने वालों को ज़ेर-ए-आब मत देखा करो| अहमद फ़राज़
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महताब मत देखा करो!
आशिक़ी में ‘मीर’ जैसे ख़्वाब मत देखा करो, बावले हो जाओगे महताब मत देखा करो| अहमद फ़राज़
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ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता!
पागल हुए जाते हो ‘फ़राज़’ उससे मिले क्या, इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता| अहमद फ़राज़
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बिछड़ने का डर भी नहीं जाता!
दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है, और तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता| अहमद फ़राज़
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अब ध्यान उधर भी नहीं जाता!
वो राहत-ए-जाँ है मगर इस दर-बदरी में, ऐसा है कि अब ध्यान उधर भी नहीं जाता | अहमद फ़राज़
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ख़ाली नहीं रहती हैं लहू से!
आँखें हैं कि ख़ाली नहीं रहती हैं लहू से, और ज़ख़्म-ए-जुदाई है कि भर भी नहीं जाता| अहमद फ़राज़
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फ़ैसला कर भी नहीं जाता!
क़ुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता, वो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता| अहमद फ़राज़