-
तेरा ठिकाना बहुत हुआ!
क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल, ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़
-
मिलना मिलाना बहुत हुआ!
अब तक तो दिल का दिल से तआ’रुफ़ न हो सका, माना कि उससे मिलना मिलाना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़
-
जान से जाना बहुत हुआ!
अब क्यूँ न ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें, इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़
-
रब्त बढ़ाना बहुत हुआ!
अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी, उससे ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़
-
वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ!
हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा, इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़
-
ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ!
उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ, अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़
-
करतूतों जैसे ही सारे काम हो गये!
एक बार फिर मैं आज हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय नईम जी का एक सुंदर नवगीत, बिना किसी भूमिका के प्रस्तुत कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नईम जी का यह नवगीत – करतूतों जैसे ही सारे काम हो गये,किष्किन्धा में लगता अपने राम खो गये। बालि और वीरप्पन से कुछ कहा…