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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Sep 2022

    तेरा ठिकाना बहुत हुआ!

    क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल, ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़

  • 16th Sep 2022

    मिलना मिलाना बहुत हुआ!

    अब तक तो दिल का दिल से तआ’रुफ़ न हो सका, माना कि उससे मिलना मिलाना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़

  • 16th Sep 2022

    जान से जाना बहुत हुआ!

    अब क्यूँ न ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें, इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़

  • 16th Sep 2022

    रब्त बढ़ाना बहुत हुआ!

    अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी, उससे ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़

  • 16th Sep 2022

    वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ!

    हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा, इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़

  • 16th Sep 2022

    ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ!

    उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ, अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ| अहमद फ़राज़

  • 16th Sep 2022

    करतूतों जैसे ही सारे काम हो गये!

    एक बार फिर मैं आज हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय नईम जी का एक सुंदर नवगीत, बिना किसी भूमिका के प्रस्तुत कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नईम जी का यह नवगीत – करतूतों जैसे ही सारे काम हो गये,किष्किन्धा में लगता अपने राम खो गये। बालि और वीरप्पन से कुछ कहा…

  • 15th Sep 2022

    फिर मुलाक़ात होगी!

    मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी| बशीर बद्र

  • 15th Sep 2022

    न बादल घिरेंगे न बरसात होगी!

    सदाओं को अल्फ़ाज़ मिलने न पाएँ, न बादल घिरेंगे न बरसात होगी| बशीर बद्र

  • 15th Sep 2022

    हमारी तुम्हारी मुलाक़ात होगी!

    जहाँ वादियों में नए फूल आए, हमारी तुम्हारी मुलाक़ात होगी| बशीर बद्र

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