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बे-नक़ाब कर दूँगा!
हज़ार पर्दों में ख़ुद को छुपा के बैठ मगर, तुझे कभी न कभी बे-नक़ाब कर दूँगा| राहत इंदौरी
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ला-जवाब कर दूँगा!
मैं इंतिज़ार में हूँ तू कोई सवाल तो कर, यक़ीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूँगा| राहत इंदौरी
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गुलाब कर दूँगा!
सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा, मैं इस बहार में सबका हिसाब कर दूँगा| राहत इंदौरी
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चारणों के दिन!
आज मैं हिन्दी नवगीत के प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| उमाकांत मालवीय जी ने इस रचना में कवियों को उनके कवि धर्म का स्मरण कराया है| मालवीय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह…
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मेरा घर बताता है!
न कोई ओहदा न डिग्री न नाम की तख़्ती, मैं रह रहा हूँ यहाँ मेरा घर बताता है| वसीम बरेलवी