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लब पे तेरा ही नाम है!
मिरे फ़िक्र-ओ-फ़न तिरी अंजुमन न उरूज था न ज़वाल है, मिरे लब पे तेरा ही नाम था मिरे लब पे तेरा ही नाम है| बशीर बद्र
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रौशनी का इमाम है!
मैं ये मानता हूँ मिरे दिए तिरी आँधियों ने बुझा दिए, मगर एक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है| बशीर बद्र
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मेरा सज्दा हराम है!
यहाँ एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें, तिरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सज्दा हराम है| बशीर बद्र
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किसी का ग़ुलाम है!
बड़े शौक़ से मिरा घर जला कोई आँच तुझ पे न आएगी, ये ज़बाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है| बशीर बद्र
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वही बुतों का निज़ाम है!
वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है, ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है| बशीर बद्र
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वाणी-विहार
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले प्रतिष्ठित कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| आज की इस रचना में मिश्र जी ने कविता के व्यवसायीकरण की ओर संकेत किया है| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की…