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उषस्(एक)
आज मैं हिन्दी के अति प्रतिष्ठित कवि तथा ज्ञानपीठ सम्मान सहित अनेक साहित्यिक उपाधियों से अलंकृत स्वर्गीय नरेश मेहता जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में सुबह के कुछ बहुत सुंदर चित्र शामिल हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेश मेहता जी की यह कविता – नीलम वंशी में से कुंकम…
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चमकता कोई तारा!
उफ़ुक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा, मुझे चराग़-ए-दयार-ए-हबीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर
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कुछ अजीब लगता है!
ये दोस्ती ये मरासिम ये चाहतें ये ख़ुलूस, कभी कभी मुझे सब कुछ अजीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर
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कोई रक़ीब लगता है!
हुदूद-ए-ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा, न कोई ग़ैर न कोई रक़ीब लगता है| जाँ निसार अख़्तर