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ये नेमत भी कम नहीं!
बे-फ़ाएदा अलम नहीं बे-कार ग़म नहीं, तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये नेमत भी कम नहीं| जिगर मुरादाबादी
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दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांगउटांग!
लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है हिन्दी साहित्य में अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक कविता| मुक्तिबोध जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है स्वर्गीय मुक्तिबोधजी की यह कविता – स्वप्न के भीतर स्वप्न,विचारधारा के भीतर औरएक अन्यसघन…
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पानी शराब कर दूँगा!
मुझे गिलास के अंदर ही क़ैद रख वर्ना, मैं सारे शहर का पानी शराब कर दूँगा| राहत इंदौरी