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ग़म-गुसार चले गए!
तिरी कज-अदाई* से हार के शब-ए-इंतिज़ार चली गई, मिरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मिरे ग़म-गुसार चले गए| *बेवफाई फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जाँ-निसार चले गए!
तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए, तिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मौज!
आज शायद पहली बार मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ हिन्दी के वरिष्ठ कवि स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी की एक कविता| शास्त्री जी को अनेक साहित्यिक सम्मान प्राप्त हुए थे तथा पद्मश्री सम्मान भी सरकार की तरफ से प्रदान किया जा रहा था, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया था| उन्होंने संस्कृत में भी अनेक रचनाएं लिखी…
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धड़कने की सदा याद!
मुद्दत हुई इक हादसा-ए-इश्क़ को लेकिन, अब तक है तिरे दिल के धड़कने की सदा याद| जिगर मुरादाबादी
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अब तक है वो नग़्मा!
छेड़ा था जिसे पहले-पहल तेरी नज़र ने, अब तक है वो इक नग़्मा-ए-बे-साज़-ओ-सदा याद| जिगर मुरादाबादी
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न अपनी ही वफ़ा याद!
दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद, अब मुझको नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद| जिगर मुरादाबादी
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नक़्श-ए-क़दम नहीं!
अब इश्क़ उस मक़ाम पे है जुस्तुजू-नवर्द, साया नहीं जहाँ कोई नक़्श-ए-क़दम नहीं| जिगर मुरादाबादी
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इनायत से कम नहीं!
शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन, तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं| जिगर मुरादाबादी
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आँखें भी नम नहीं!
या रब हुजूम-ए-दर्द को दे और वुसअ‘तें, दामन तो क्या अभी मिरी आँखें भी नम नहीं| जिगर मुरादाबादी