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बरबाद करते हैं!
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं, वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं| बृज नारायण चकबस्त
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दिल का ये आलम है!
ख़ुदा को भूलकर इंसान के दिल का ये आलम है, ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता| बृज नारायण चकबस्त
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इन आँखों से जुदा होता
रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी, क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता| बृज नारायण चकबस्त
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बुतों की बेवफ़ाई पर!
हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर, अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता| बृज नारायण चकबस्त
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जंगल हरा होता!
बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता, जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता| बृज नारायण चकबस्त
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न जीने का मज़ा होता!
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता, न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता| चकबस्त बृज नारायण
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अहिंसा!
आज एक बार फिर मैं जनकवि बाबा नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में अहिंसा को एक भिखारिन के रूप में दर्शाया गया है| बाबा नागार्जुन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है जनकवि बाबा नागार्जुन जी की यह कविता – 105 साल…