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किनारा है इन दिनों!
हर सैल-ए-अश्क साहिल-ए-तस्कीं है आज-कल, दरिया की मौज मौज किनारा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई
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वही चारा है इन दिनों
दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों, पहले जो दर्द था वही चारा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई
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स्वेटर!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता – तुमने जो स्वेटर मुझे बुनकर दिया है उसमें कितने…
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मुकम्मल नहीं होते!
सब ख़्वाहिशें पूरी हों ‘फ़राज़’ ऐसा नहीं है, जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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कुछ याद-जज़ीरे हैं!
कैसे ही तलातुम हों मगर क़ुल्ज़ुम-ए-जाँ में, कुछ याद-जज़ीरे हैं कि ओझल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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जल-थल नहीं होते!
शाइस्तगी-ए-ग़म के सबब आँखों के सहरा, नमनाक तो हो जाते हैं जल-थल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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कभी हल नहीं होते!
कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं, कुछ ऐसे मुअम्मे हैं कभी हल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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करिश्मे भी अजब हैं!
अंदर की फ़ज़ाओं के करिश्मे भी अजब हैं, मेंह टूट के बरसे भी तो बादल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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मगर कल नहीं होते!
ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते, जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते| अहमद फ़राज़