Category: Uncategorized
-
गई बात छेड़ देती है!
मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को, मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है| गुलज़ार
-
टाँके उधेड़ देती है!
हवा के सींग न पकड़ो खदेड़ देती है, ज़मीं से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है| गुलज़ार
-
नीली सतह पर!
आज एक बार फिर मैं पद्मभूषण जैसे उच्च नागरिक सम्मान और ज्ञानपीठ सहित अनेक साहित्यिक सम्मानों से विभूषित हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वे अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक में भी एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में सम्मिलित थे| कुँवर नारायण जी की कुछ…
-
न तो आने की ख़बर है!
किस को रोके कोई रस्ते में कहाँ बात करे, न तो आने की ख़बर है न पता जाने का| गुलज़ार
-
अंदाज़ था फ़रमाने का!
मैं ने अल्फ़ाज़ तो बीजों की तरह छाँट दिए, ऐसा मीठा तिरा अंदाज़ था फ़रमाने का| गुलज़ार
-
बुलबुला फिर से चला!
बुलबुला फिर से चला पानी में ग़ोते खाने, न समझने का उसे वक़्त न समझाने का| गुलज़ार
-
इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है!
एक सन्नाटा दबे-पाँव गया हो जैसे, दिल से इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का| गुलज़ार
-
मिरे अफ़्साने का!
ज़िक्र होता है जहाँ भी मिरे अफ़्साने का, एक दरवाज़ा सा खुलता है कुतुब-ख़ाने* का| *Research Library गुलज़ार
-
मोआमला तो रहा!
ये और बात कि हर छेड़ ला-उबाली थी, तिरी नज़र का दिलों से मोआमला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर