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अक़्ल के आगे है क्या!
हम से दीवानों के बिन दुनिया सँवरती किस तरह, अक़्ल के आगे है क्या दीवानगी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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गुनगुनाहट तो सुनो!
उस नज़र की उस बदन की गुनगुनाहट तो सुनो, एक सी होती है हर इक रागनी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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जिस्म की हर बात है!
जिस्म की हर बात है आवारगी ये मत कहो, हम भी कर सकते हैं ऐसी शायरी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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दाम्पत्य!
आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ हिन्दी नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – नदी की यह खास आदत हैकि झरने के मुखर उन्माद जल…
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आँखों की तरह होती हैं
आप को देख के जिस वक़्त पलटती है नज़र, मेरी आँखें मिरी आँखों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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कुछ उमीदें भी!
टूट कर ये भी बिखर जाती हैं इक लम्हे में, कुछ उमीदें भी घरोंदों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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चिड़ियों की तरह!
उड़ के इक रोज़ बहुत दूर चली जाती हैं, घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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घर में रहते हुए!
घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं, लड़कियाँ धान के पौदों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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नववर्ष 2024!
अनेक समस्याओं से जूझते हुए, दुनिया के बहुत से क्षेत्रों में युद्ध के माहौल में यह साल गुज़र गया और अब कोरोना के मामले फिर से डराने लगे हैं| आखिर आ ही गया नया साल! एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट को संशोधित रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ| नववर्ष का शिशु, धरती पर अपने नन्हे पांव…