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साँसों में घुल रही है!
साँसों में घुल रही है किसी साँस की महक, दामन को छू रहा है कोई हात क्या करें| साहिर लुधियानवी
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महंगाई!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के प्रसिद्ध हास्य कवि स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| काका जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय काका हाथरसी जी की यह कविता – जन-गण मन के देवता, अब तो आँखें खोलमहँगाई से…
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ख़यालात क्या करें!
पेड़ों के बाज़ुओं में महकती है चाँदनी, बेचैन हो रहे हैं ख़यालात क्या करें| साहिर लुधियानवी
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जज़्बात क्या करें!
इतनी हसीन इतनी जवाँ रात क्या करें, जागे हैं कुछ अजीब से जज़्बात क्या करें| साहिर लुधियानवी
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मैं इक दिन ख़ुद ही!
मुझ को समझाओ न ‘साहिर’ मैं इक दिन ख़ुद ही, ठोकरें खा के मोहब्बत में सँभल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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आह बन कर तिरे!
दर्द कहता है ये घबरा के शब-ए-फ़ुर्क़त में, आह बन कर तिरे पहलू से निकल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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तेरा वा’दा तो नहीं हूँ!
मेरी तक़दीर में जलना है तो जल जाऊँगा, तेरा वा‘दा तो नहीं हूँ जो बदल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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यह दौर सांप का डसा हुआ!
आज एक बार फिर मैं वाराणसी के विख्यात नवगीतकार स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| तिवारी जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का यह नवगीत – मीठी लगने लगी नीम की पत्ती -पत्तीलगता है यह दौर सांप…
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वहशत तेरे दीवाने में है
तू कहे तो आसमाँ की धज्जियाँ कर दूँ सनम, आज इक ऐसी ही वहशत तेरे दीवाने में है| हसरत जयपुरी