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किस दिल से आए हैं!
उठ कर तो आ गए हैं तिरी बज़्म से मगर, कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आए हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जितने चराग़ हैं!
शम-ए-नज़र ख़याल के अंजुम जिगर के दाग़, जितने चराग़ हैं तिरी महफ़िल से आए हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सब क़त्ल हो के तेरे!
सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं, हम लोग सुर्ख़-रू हैं कि मंज़िल से आए हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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वह आया!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| द्विवेदी जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की, गांधी जी के विराट व्यक्तित्व पर केंद्रित यह कविता – मन में नूतन बल सँवारताजीवन…
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परिंद अपने परों का!
फ़ज़ा-ए-शौक़ में उस की बिसात ही क्या थी, परिंद अपने परों का निशाना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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झोंका बहाना हो गया है
हमें तो ख़ैर बिखरना ही था कभी न कभी, हवा-ए-ताज़ा का झोंका बहाना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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जल रहे हैं सदियों से!
कहाँ है तू कि यहाँ जल रहे हैं सदियों से, चराग़ दीदा ओ मेहराब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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मेरे ही साथ डूब गया!
अजब हरीफ़ था मेरे ही साथ डूब गया, मिरे सफ़ीने को ग़र्क़ाब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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कि नींद शर्त नहीं!
उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए, कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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नई बात क्या करें!
शायद तुम्हारे आने से ये भेद खुल सके, हैरान हैं कि आज नई बात क्या करें| साहिर लुधियानवी