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फ़स्ल-ए-गुल में बहार!
फ़स्ल-ए-गुल में बहार पहला गुलाब, किस की ज़ुल्फ़ों में टाँकती है अभी| अहमद फ़राज़
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कम सुपुर्दगी है अभी!
गरचे पहला सा इज्तिनाब* नहीं, फिर भी कम कम सुपुर्दगी है अभी| *दूर रहना अहमद फ़राज़
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क्या किया आज तक क्या पाया!
आज पहली बार मैं हिन्दी के प्रमुख व्यंग्यकार स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| परसाई जी ने शायद कुछ ही कविताएं लिखी हैं, जिनमें से एक मैं शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की यह कविता – मैं सोच रहा, सिर पर अपारदिन, मास,…
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गुमनाम से पहले पहले!
कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे ‘फ़राज़’, ग़ैर-मारूफ़ से गुमनाम से पहले पहले|