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ओ2 और ईस्ट हैम!
लंदन में पहले की गई यात्राओं की तरह इस बार के प्रवास में भी पिछले सप्ताहांत में हमने इन दो स्थानों का भ्रमण किया| ओ2 तो ऐसा मान सकते हैं हमारे यहाँ से नदी पार ही है, जैसा किसी ज़माने में मेरे लिए शाहदरा से दिल्ली आना होता था| वहाँ यमुना नदी थी, जिस पर…
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लिए ग़ुबार चले!
न जाने कौन सी मिट्टी वतन की मिट्टी थी, नज़र में धूल जिगर में लिए ग़ुबार चले| गुलज़ार
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रुक के बार बार चले!
रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले, क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले| गुलज़ार
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हरियाली के ऊपर- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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आँखें झपकते रहते हैं!
भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में, उजाला हो तो हम आँखें झपकते रहते हैं| गुलज़ार
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ये रोटियाँ हैं ये सिक्के
ये रोटियाँ हैं ये सिक्के हैं और दाएरे हैं, ये एक दूजे को दिन भर पकड़ते रहते हैं| गुलज़ार