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जाड़े की गुलाबी रातें!
कम नहीं नश्शे में जाड़े की गुलाबी रातें, और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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क्यूँ न खिलते हुए!
इन्हीं गुल-रंग दरीचों से सहर झाँकेगी, क्यूँ न खिलते हुए ज़ख़्मों को दुआ दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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चटानों में दबा दी जाए!
दिल का वो हाल हुआ है ग़म-ए-दौराँ के तले, जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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जीवन-डाली से!
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में एक बार फिर से मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की कविता शेयर कर रहा हूँ| पंत जी को प्रकृति के सुकुमार कवि भी कहा जाता है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – झर पड़ता…
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ये रस्म उठा दी जाए!
जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए, है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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तो कुछ बात बनेगी!
ये क्या है कि बढ़ते चलो बढ़ते चलो आगे, जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर
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न तिरे साथ बनेगी!
ये हमसे न होगा कि किसी एक को चाहें, ऐ इश्क़ हमारी न तिरे साथ बनेगी| जाँ निसार अख़्तर
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कुछ और तो क्या!
ऐ नावक-ए-ग़म दिल में है इक बूँद लहू की, कुछ और तो क्या हम से मुदारात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर
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आख़िर कोई तक़रीब!
उनसे यही कह आएँ कि अब हम न मिलेंगे, आख़िर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर
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रात की औक़ात बनेगी!
सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी, तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर