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किया ज़माने ने मुझ को!
सच कहने पर ख़ुश होना तो दूर रहा, किया ज़माने ने मुझ को शर्मिंदा और| राजेश रेड्डी
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मुझ में जाने क्या क्या और!
दरवाज़े के अंदर इक दरवाज़ा और, छुपा हुआ है मुझ में जाने क्या क्या और| राजेश रेड्डी
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बारिश में घर लौटा कोई!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ व्यंग्य कवि और गीतकार स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का यह नवगीत – बारिश में घर लौटा कोई दर्पण देख रहा न्यूटन जैसे पृथ्वी का आकर्षण देख…
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न रख पाए ज़बाँ अपनी ख़मोश!
हम न रख पाए ज़बाँ अपनी ख़मोश, सर तो जाना ही था सर जाने दिया| राजेश रेड्डी
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ख़ुद को मर जाने दिया!
कर ही क्या सकते थे हम सो उम्र भर, रफ़्ता-रफ़्ता ख़ुद को मर जाने दिया| राजेश रेड्डी
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ख़ाली-पन से भर जाने दिया!
इक ख़ला* अंदर उतर जाने दिया, ख़ुद को ख़ाली-पन से भर जाने दिया| *खालीपन राजेश रेड्डी