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हसीनों की अंजुमन में रहे!
हमें शुऊर-ए-जुनूँ है कि जिस चमन में रहे, निगाह बन के हसीनों की अंजुमन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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होश में लाए हुए हैं हम!
छाई हुई है इश्क़ की फिर दिल पे बे-ख़ुदी, फिर ज़िंदगी को होश में लाए हुए हैं हम| जोश मलीहाबादी
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फिर सर किसी के दर पे!
फिर सर किसी के दर पे झुकाए हुए हैं हम, पर्दे फिर आसमाँ के उठाए हुए हैं हम| जोश मलीहाबादी
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मिरे सब गुनाह बख़्श दिए!
मिरे ख़ुदा ने मिरे सब गुनाह बख़्श दिए, किसी का रात को यूँ मैं ने इंतिज़ार किया| जोश मलीहाबादी
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हम ने ए’तिबार किया!
सुबूत है ये मोहब्बत की सादा-लौही का, जब उस ने वअ‘दा किया हम ने ए’तिबार किया| जोश मलीहाबादी
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शिकवा हज़ार बार किया!
तुम्हारा ज़िक्र नहीं है तुम्हारा नाम नहीं, किया नसीब का शिकवा हज़ार बार किया| जोश मलीहाबादी
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वो सब्र दे कि न दे!
वो सब्र दे कि न दे जिस ने बे-क़रार किया, बस अब तुम्हीं पे चलो हम ने इंहिसार* किया| *Dependance जोश मलीहाबादी
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फागुन!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी का यह नवगीत – अरे ओ निरगुन फागुन मास!मेरे कारागृह के शून्य अजिर में मत कर…
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अजब मुसाफ़िर हूँ मैं!
अजब मुसाफ़िर हूँ मैं मेरा सफ़र अजीब, मेरी मंज़िल और है मेरा रस्ता और| राजेश रेड्डी