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वो गुदगुदाना याद है!
शौक़ में मेहंदी के वो बे-दस्त-ओ-पा होना तिरा, और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है| हसरत मोहानी
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वो ठिकाना याद है!
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह, मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है| हसरत मोहानी
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ख़ुद रूठ जाना याद है!
देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से, जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है| हसरत मोहानी
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बातों में उड़ाना याद है!
मीठी मीठी छेड़ कर बातें निराली प्यार की, ज़िक्र दुश्मन का वो बातों में उड़ाना याद है| हसरत मोहानी
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तेरा बुलाना याद है!
आज तक नज़रों में है वो सोहबत-ए-राज़-ओ-नियाज़, अपना जाना याद है तेरा बुलाना याद है| हसरत मोहानी
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आजा मेरे बचपन आजा!
आज एक बार मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों पर अपने गीतों के माध्यम से धूम मचाने वाले श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| निर्धन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी का यह…
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वो तिरा रो रो के!
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़, वो तिरा रो रो के मुझको भी रुलाना याद है| हसरत मोहानी
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बातों में जताना याद है!
तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़, हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है| हसरत मोहानी
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वो मुँह छुपाना याद है!
खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ‘तन, और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है| हसरत मोहानी