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उँगली दबाना याद है!
तुझसे कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा, और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है| हसरत मोहानी
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वो ज़माना याद है!
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है, हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है| हसरत मोहानी
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तिरा क्या ख़याल है!
फिर कोई ख़्वाब देखूँ कोई आरज़ू करूँ, अब ऐ दिल-ए-तबाह तिरा क्या ख़याल है| जावेद अख़्तर
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ये मेरा ही जाल है!
बे-दस्त-ओ-पा हूँ आज तो इल्ज़ाम किसको दूँ, कल मैंने ही बुना था ये मेरा ही जाल है| जावेद अख़्तर
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जो शीशे में बाल है!
आसूदगी* से दिल के सभी दाग़ धुल गए, लेकिन वो कैसे जाए जो शीशे में बाल है| *खुशहाली जावेद अख़्तर
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मुझे क्या मलाल है!
घर से चला तो दिल के सिवा पास कुछ न था, क्या मुझसे खो गया है मुझे क्या मलाल है| जावेद अख़्तर
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नई उमरिया प्यासी है!
आज एक बार मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का यह गीत – घनश्याम कहाँ…
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ये क्या मेरा हाल है!
मैं ख़ुद भी सोचता हूँ ये क्या मेरा हाल है, जिसका जवाब चाहिए वो क्या सवाल है| जावेद अख़्तर