Category: Uncategorized
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उनके वादों में हुई है!
जितने वादे कल थे उतने आज भी मौजूद हैं, उनके वादों में हुई है कुछ कमी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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चलना हमारा काम है!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि स्वर्गीय शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ जी की यह कविता – गति प्रबल पैरों में भरीफिर क्यों रहूं…
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पाँव इतने तेज़ हैं!
पाँव इतने तेज़ हैं उठते नज़र आते नहीं, आज थक कर रह गया है आदमी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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सोने की ज़ंजीरें कहाँ!
कट सकी हैं आज तक सोने की ज़ंजीरें कहाँ, हम भी अब आज़ाद हैं यारो अभी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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अक़्ल के आगे है क्या!
हम से दीवानों के बिन दुनिया सँवरती किस तरह, अक़्ल के आगे है क्या दीवानगी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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गुनगुनाहट तो सुनो!
उस नज़र की उस बदन की गुनगुनाहट तो सुनो, एक सी होती है हर इक रागनी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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जिस्म की हर बात है!
जिस्म की हर बात है आवारगी ये मत कहो, हम भी कर सकते हैं ऐसी शायरी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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दाम्पत्य!
आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ हिन्दी नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – नदी की यह खास आदत हैकि झरने के मुखर उन्माद जल…
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आँखों की तरह होती हैं
आप को देख के जिस वक़्त पलटती है नज़र, मेरी आँखें मिरी आँखों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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कुछ उमीदें भी!
टूट कर ये भी बिखर जाती हैं इक लम्हे में, कुछ उमीदें भी घरोंदों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना