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इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है!
एक सन्नाटा दबे-पाँव गया हो जैसे, दिल से इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का| गुलज़ार
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मिरे अफ़्साने का!
ज़िक्र होता है जहाँ भी मिरे अफ़्साने का, एक दरवाज़ा सा खुलता है कुतुब-ख़ाने* का| *Research Library गुलज़ार
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मोआमला तो रहा!
ये और बात कि हर छेड़ ला-उबाली थी, तिरी नज़र का दिलों से मोआमला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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शब्दों की पुकार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी को आपातकाल में लिखी गई उनकी ग़ज़लों के संग्रह ‘साये में धूप’ के लिए विशेष रूप से खयाती मिली थी| दुष्यंत जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|…
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फ़ासला तो रहा!
मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में, बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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न अक़्ल हार सकी!
चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी, तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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क़दम क़दम पे कोई!
गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने, क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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हौसला तो रहा!
तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा, ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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दिल में अपने दर्द की!
दिल में अपने दर्द की छिटकी हुई है चाँदनी, हर तरफ़ फैली हुई है तीरगी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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उनके वादों में हुई है!
जितने वादे कल थे उतने आज भी मौजूद हैं, उनके वादों में हुई है कुछ कमी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर