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ये सज़ा कम तो नहीं!
क्यूँ हमें मौत के पैग़ाम दिए जाते हैं,ये सज़ा कम तो नहीं है के जिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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मैं बोल रहा हूँ तुझ में!
बेवफ़ा तेरी ज़बाँ पर ये वफ़ा की बातें,ऐसा लगता है कि मैं बोल रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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तुझे ढूँढ रहा हूँ तुझ में!
पास इतना कि तिरी साँस से टकराती है साँस,दूर इतना कि तुझे ढूँढ रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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टहनी पर फूल जब खिला!
आज एक बार फिर मैं विख्यात नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| | इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – ‘टहनी पर फूल जब खिलाहमसे देखा नहीं गया । एक फूल निवेदित कियागुलदस्ते के हिसाब…
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देख रहा हूँ तुझ में!
तेरे चेहरे से हटाई नहीं जातीं नज़रें,क्या ख़बर देर से क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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भूल गया हूँ तुझ में!
तुझ से बिछड़े तो ज़माना हुआ लेकिन अब तक,याद आता है कि कुछ भूल गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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मैं देख चुका हूँ तुझमें!
मेरा दावा है कि तू ने भी न देखे होंगे,ऐसे जल्वे कि जो मैं देख चुका हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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तू वो दरिया है कि!
तू वो दरिया है कि जिस का कोई साहिल ही नहीं,मैं सफ़ीने की तरह डूब गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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इक फूल की मानिंद!
तू ने अब तक मुझे काँटों के सिवा कुछ न दिया,मैं तो इक फूल की मानिंद खिला हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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देख रहा हूँ तुझ में!
बा-वफ़ाई की अदा पाने लगा हूँ तुझ में,ऐ जफ़ा-दोस्त ये क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी