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दर्द के गीत गा सके!
अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल, कौन तिरी तरह ‘हफ़ीज़’ दर्द के गीत गा सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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जिसे समझ में आ सके
इज्ज़*से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज**-ए-दोस्त, अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके| *बेबसी, नाराजगी हफ़ीज़ जालंधरी
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मरण-त्योहार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य जगत में गीतों के राजकुंवर के नाम से प्रसिद्ध रहे और हिन्दी फिल्मों को कुछ अमर गीत देने वाले प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय गोपालदास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…
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हमसे नज़र मिला सके!
शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ, किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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लब न मगर हिला सके!
रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं, दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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सर न मगर उठा सके!
होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम, बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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हम न तुम्हें भुला सके!
हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके, तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके| हफ़ीज़ जालंधरी