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दूर कटा कवि मैं जनता का !
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ अग्रवाल जी की यह कविता – दूर कटा कविमैं जनता का, कच-कच करताकचर रहा हूँ अपनी माटी;मिट-मिट करमैं सीख रहा हूँगतिपल जीने की परिपाटी…
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तस्दीक़ कराए जाकर!
अपने शजरे* कि वो तस्दीक़ कराए जा कर,जिस को ज़ंजीर पहनते हुए डर लगता है|*वंश अब्बास ताबिश
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ओढ़ लेता हूँ तो सब!
वक़्त लफ़्ज़ों से बनाई हुई चादर जैसा,ओढ़ लेता हूँ तो सब ख़्वाब हुनर लगता है| अब्बास ताबिश
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तुम तो कहते थे कि!
मुझ से तो दिल भी मोहब्बत में नहीं ख़र्च हुआ,तुम तो कहते थे कि इस काम में घर लगता है| अब्बास ताबिश
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अब वो रस्ता भी मुझे!
जिस पे चलते हुए सोचा था कि लौट आऊँगा,अब वो रस्ता भी मुझे शहर-बदर लगता है| अब्बास ताबिश
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कारवाँ गुज़र गया -7
मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से प्रस्तुत है मेरे स्वर में, नीरज जी के इस गीत का अगला भाग, जिसे फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ के लिए मोहम्मद रफी जी ने गाया था- कारवाँ गुज़र गया बहार देखते रहे -7 आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। *******
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हम को दिल ने नहीं!
हम को दिल ने नहीं हालात ने नज़दीक किया,धूप में दूर से हर शख़्स शजर लगता है| अब्बास ताबिश
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बीती ना बिताई रैना!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में परिचय फिल्म का गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे गुलज़ार साहब ने लिखा था और राहुल देव बर्मन जी के संगीत निर्देशन में भूपेंद्र सिंह जी और लता मंगेशकर जी ने गाया था- बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना! आशा है आपको…
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चाँद दीवार पे रक्खा!
रात को घर से निकलते हुए डर लगता है,चाँद दीवार पे रक्खा हुआ सर लगता है| अब्बास ताबिश
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कमरे में धूप!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। कुंवर नारायण जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की यह कविता – हवा और दरवाज़ों में बहस होती रही,दीवारें सुनती रहीं।धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठीकिरणों के…